य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह |
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ||१३-२४||
ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha . sarvathā vartamāno.api na sa bhūyo.abhijāyate ||13-24||
।।13.24।। इस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।
13.24 यः who? एवम् thus? वेत्ति knows? पुरुषम् Purusha? प्रकृतिम् Prakriti? च and? गुणैः alities? सह with? सर्वथा in all ways? वर्तमानः living? अपि also? न not? सः he? भूयः again? अभिजायते is born.Commentary One who knows the Soul and Nature with its alities? whatever his conduct may be? frees himself from the cycle of births and deaths. Such is the advantage he gains from the discriminative knowledge of Spirit and Matter. He knows that he is eternal and changeless and that all changes are due t
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
।।13.24।।इस प्रकार उस उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त आत्माको --, उस पुरुषको जो मनुष्य उपर्युक्त प्रकारसे अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे कि यही मैं हूँ इस प्रकार जानता है और उपर्युक्त अविद्यारूप प्रकृतिको भी? अपने विकाररूप गुणोंके सहित? विद्याद्वारा निवृत्त की हुई -- अभावको प्राप्त की हुई जानता है। वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी? इस विद्वत्शरीरके नाश होनेपर फिर दूसरे शरीरमें जन्म नहीं लेता अर्थात् दूसरे शरीरको ग्रहण नहीं करता। अपि शब्दसे यह अभिप्राय है कि अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुकूल बर्तनेवाला पुनः उत्पन्न नहीं होता? इसमें तो कहना ही क्या है पू0 -- यद्यपि ज्ञान उत्पन्न होनेके पश्चात् पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया है? तथापि ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए? ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् किये जानेवाले और अनेक भूतपूर्व जन्मोंमें किये हुए जो कर्म हैं? फल प्रदान किये बिना उनका नाश मानना युक्तियुक्त नहीं है? अतः ( ज्ञान प्राप्त होनेके बाद भी ) तीन जन्म और होने चाहिये। अभिप्राय यह है कि सभी कर्म समान हैं? उनमें कोई भेद प्रतीत नहीं होता? अतः फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए जन्मारम्भ करनेवाले प्रारब्ध कर्मोंके समान ही किये हुए अन्य कर्मोंका भी ( बिना फल दिये ) नाश ( मानना ) उचित नहीं? सुतरां तीनों प्रकारके कर्म तीन जन्मोंका आरम्भ करेंगे अथवा सब मिलकर एक जन्मका ही आरम्भ करेंगे ( ऐसा मानना चाहिये )। नहीं तो किये हुए कर्मोंका ( बिना फल दिये ) नाश माननेसे? सर्वत्र अविश्वासका प्रसंग आ जायगा और शास्त्रकी व्यर्थता सिद्ध हो जायगी। अतः यह कहना कि वह फिर जन्म नहीं लेता ठीक नहीं है। उ0 -- यह बात नहीं क्योंकि इसके समस्त कर्म क्षय हो जाते हैं ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है उसके ( मोक्षमें ) तभीतककी देर है अग्निमें तृणके अग्रभागकी भाँति उसके समस्त कर्म भस्म हो जाते हैं इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा विद्वान्के सब कर्मोंका दाह होना कहा गया है। यहाँ गीताशास्त्रमें भी यथैधांसि इत्यादि श्लोकमें समस्त कर्मोंका दाह कहा गया है और आगे भी कहेंगे। युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है क्योंकि अविद्या? कामना आदि क्लेशरूप बीजोंसे युक्त हुए ही कारणरूप कर्म अन्य जन्मरूप अंकुरका आरम्भ किया करते हैं। यहाँ गीताशास्त्रमें भी भगवान्ने जगहजगह कहा है कि अहंकार और फलाकाङ्क्षायुक्त कर्म ही फलका आरम्भ करनेवाले होते हैं? अन्य नहीं। तथा जैसे अग्निमें दग्ध हुए बीज फिर नहीं उगते? वैसे ही ज्ञानसे दग्ध हुए क्लेशोंद्वारा आत्मा पुनः शरीर,ग्रहण नहीं करता ऐसा भी ( शास्त्रोंका वचन है )। पू0 -- ज्ञान होनेके पश्चात् किये हुए कर्मोंका ज्ञानद्वारा दाह हो सकता है क्योंकि वे ज्ञानके साथ होते हैं। परंतु इस जन्ममें ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए और भूतपूर्व अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंका? ज्ञानद्वारा नाश मानना उचित नहीं। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि सारे कर्म ( दग्ध हो जाते हैं ) ऐसा विशेषण दिया गया है। पू0 -- यदि ऐसा मानें कि ज्ञानके पश्चात् होनेवाले सब कर्मोंका ही ( ज्ञानद्वारा दाह होता है तो ) उ0 -- यह बात नहीं है। क्योंकि ( इस प्रकारके ) संकोचका ( कोई ) कारण नहीं सिद्ध होता। तुमने जो कहा कि जैसे ज्ञान हो जानेपर भी? वर्तमान जन्मका आरम्भ करनेवाले? फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए प्रारब्धकर्म नष्ट नहीं होते? वैसे ही जिनका फल आरम्भ नहीं हुआ है? उन कर्मोंका भी नाश ( मानना ) युक्तियुक्त नहीं है? सो ऐसा कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि वे प्रारब्ध कर्म छोड़े हुए बाणकी भाँति फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं? इसलिये ( उनका फल अवश्य होता है? पर अन्यका नहीं )। जैसे पहले लक्ष्यका वेध करनेके लिये धनुषसे छोड़ा हुआ बाण? लक्ष्यवेध हो जानेके पश्चात् ही आरम्भ हुए वेगका नाश होनेपर गिरकर ही शान्त होता है? वैसे ही शरीरका आरम्भ करनेवाले प्रारब्ध कर्म भी? शरीरस्थितिरूप प्रयोजनके निवृत्त हो जानेपर भी? जबतक संस्कारोंका वेग क्षय नहीं हो जाता? तबतक पहलेकी भाँति बर्तते ही रहते हैं। वही बाण? जिसका प्रवृत्तिके लिये वेग आरम्भ नहीं हुआ है -- जो छोड़ा नहीं गया है? यदि धनुषपर चढ़ा भी लिया गया हो तो भी उसको रोका जा सकता है? वैसे ही जिन कर्मोंके फलका आरम्भ नहीं हुआ है? वे अपने आश्रयमें स्थित हुए ही ज्ञानद्वारा निर्बीज किये जा सकते हैं। अतः इस विद्वत्शरीरके गिरनेके पीछे वह फिर उत्पन्न नहीं होता यह कहना उचित ही है? यह बात सिद्ध हुई।
(Showing excerpt)
13.24 He who knows thus the Person and Nature along with the alities will not be born again, in whatever way he may live.
This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.
to save your reflections on each verse.
Want to explore this verse deeper?