यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् |
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ||१३-२७||
yāvatsañjāyate kiñcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam . kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha ||13-27||
।।13.27।। हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।
13.27 यावत् whatever? सञ्जायते is born? किञ्चित् any? सत्त्वम् being? स्थावरजङ्गमम् the unmoving and the moving? क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् from the union between the field and the knower of the field? तत् that? विद्धि know? भरतर्षभ O best of the Bharatas.Commentary O Arjuna? remember that whatever is born? unmoving or moving? know thou that to be done to the union between the body and the Self.The knower of the field is like the ether without parts. Therefore? there cannot be a union of the fiel
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
।।13.27।।क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकताविषयक ज्ञान मोक्षका साधन है? यह बात यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते इस वाक्यसे कही? परंतु वह ज्ञान किस कारणसे मोक्षका साधन है उस कारणको दिखानेके लिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है --, हे भरतश्रेष्ठ जो कुछ भी वस्तु उत्पन्न होती है? क्या यहाँ समानभावसे वस्तुमात्रका ग्रहण है इसपर कहते हैं कि जो कुछ स्थावरजंगम यानी चर और अचर वस्तु उत्पन्न होती है? वह सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न होती है? इस प्रकार तू जान। पू0 -- इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे क्या अभिप्राय है क्योंकि क्षेत्रज्ञ? आकाशके समान अवयवरहित है? इसलिये उसका क्षेत्रके साथ रस्सीसे घड़ेके सम्बन्धकी भाँति? अवयवोंके संसर्गसे होनेवाला सम्बन्धरूप संयोग नहीं हो सकता। वैसे ही आपसमें एकदूसरेका कार्यकारणभाव न होनेसे सूत और कपड़ेकी भाँति? क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका समवायसम्बन्धरूप संयोग भी नहीं बन सकता। उ0 -- बताया जाता है? ( सुनो )। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ? जो कि विषय और विषयी तथा भिन्न स्वभाववाले हैं? उनका? अन्यमें अन्यके धर्मोंका अध्यासरूप संयोग है? यह संयोग रज्जु और सीप आदिमें उनके स्वरूपसम्बन्धी ज्ञानके अभावसे अध्यारोपित सर्प और चाँदी आदिके संयोगकी भाँति? क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण है। ऐसा यह अध्यासस्वरूप क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग मिथ्या ज्ञान है। जो पुरुष शास्त्रोक्त रीतिसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके लक्षण और भेदको जानकर? पहले जिसका स्वरूप दिखलाया गया है? उस क्षेत्रसे मूँजमेंसे सींक अलग करनेकी भाँति पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त क्षेत्रज्ञको अलग करके देखता है अर्थात् उस ज्ञेयस्वरूप क्षेत्रज्ञको न सत्तन्नासदुच्यते इस वाक्यानुसार समस्त उपाधिरूप विशेषताओंसे अतीत ब्रह्मस्वरूपसे देख लेता है। तथा जो क्षेत्रको मायासे रचे हुए हाथी? स्वप्नमें देखी हुई वस्तु या गन्धर्वनगर आदिकी भाँति यह वास्तवमें नहीं है तो भी सत्की भाँति प्रतीत होता है? ऐसे निश्चयपूर्वक जान लेता है? उसका मिथ्याज्ञान उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानसे विरुद्ध होनेके कारण नष्ट हो जाता है। पुनर्जन्मके कारणरूप उस मिथ्याज्ञानका अभाव हो जानेपर य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह इस श्लोकसे जो यह कहा गया है कि विद्वान् पुनः उत्पन्न नहीं होता सो युक्तियुक्त ही है।
(Showing excerpt)
13.27 O scion of the Bharata dynasty, whatever object, moving or non-moving, comes into being, know that to be from the association of the field and the Knower of the field!
This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.
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