समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् |
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ||१३-२९||
samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram . na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim ||13-29||
।।13.29।। निश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।
13.29 समम् eally? पश्यन् seeing? हि indeed? सर्वत्र everywhere? समवस्थितम् eally dwelling? ईश्वरम् the Lord? न not? हिनस्ति destroys? आत्मना by the self? आत्मानम् the Self? ततः then? याति goes? पराम् the highest? गतिम् the goal.Commentary This is the vision of a liberated sage. The Supreme Self abides in all forms. There is nothing apart from It.An ignorant man destroyes the Self by identifying himself with the body and the modifications of the mind and by not seeing the one Self in all beings.
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
।।13.29।।उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानका फल बतलाकर उसकी स्तुति करनी चाहिये। इसलिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है --, क्योंकि सर्वत्र -- सब भूतोंमें समभावसे स्थित हुए ईश्वरको अर्थात् ऊपरके श्लोकमें जिसके लक्षण बतलाये गये हैं? उस ( परमेश्वर ) को सर्वत्र समान भावसे देखनेवाला पुरुष स्वयं -- अपने आप अपनी हिंसा नहीं करता? इसलिये अर्थात् अपनी हिंसा न करनेके कारण वह मोक्षरूप परम उत्तम गतिको प्राप्त होता है। पू0 -- कोई भी प्राणी स्वयं अपनी हिंसा नहीं करता फिर यह अप्राप्तका निषेध क्यों किया जाता है कि वह अपनी हिंसा नहीं करता जैसे कोई कहे कि पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें अग्नि नहीं जलानी चाहिये। उ0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अज्ञानियोंसे स्वयं अपना तिरस्कार करना बन सकता है। सभी अज्ञानी अत्यन्त प्रसिद्ध साक्षात् -- प्रत्यक्ष आत्माका तिरस्कार करके अनात्मा शरीरादिको आत्मा मानकर? फिर धर्म और अधर्मका आचरण कर? उस प्राप्त किये हुए ( शरीररूप ) आत्माका नाश करके दूसरे नये ( शरीररूप ) आत्माको प्राप्त करते हैं। फिर उसका भी इसी प्रकार नाश करके अन्यको और उसका भी वैसे ही नाश करके ( पुनः ) अन्यको पाते रहते हैं। इस प्रकार बारंबार शरीररूप आत्माको प्राप्त करके उसकी हिंसा करते जाते हैं? अतः सभी अज्ञानी आत्महत्यारे हैं। जो वास्तवमें आत्मा है वह भी अविद्याद्वारा ( अज्ञात होनेके कारण ) सदा मारा हुआसा ही रहता है क्योंकि उनके लिये उसका विद्यमान फल भी नहीं होता। सुतरां अभी अविद्वान् आत्माकी हिंसा करनेवाले ही हैं। परंतु जो इनसे अन्य उपर्युक्त आत्मस्वरूपको जाननेवाला है? वह दोनों प्रकारसे ही अपनेद्वारा अपना नाश नहीं करता है। इसलिये वह परमगति प्राप्त कर लेता है अर्थात् उसे पहले बताया हुआ ( परम गतिरूप ) फल प्राप्त होता है।
(Showing excerpt)
13.29 Since by seeing eally God who is present alike everywhere he does not injure the Self by the Self, therefore he attains the supreme Goal.
This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.
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