यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते |
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||१८-१७||
yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate . hatvā.api sa imā.Nllokānna hanti na nibadhyate ||18-17||
।।18.17।। जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।
18.17 यस्य whose? न not? अहंकृतः egoistic? भावः the notion? बुद्धिः intelligence? यस्य of whom? न not? लिप्यते is tainted? हत्वा having slain? अपि even? सः he? इमान् these? लोकान् people? न not? हन्ति slays? न not? निबध्यते is bound.Commentary I will explain to thee? O Arjuna? the characterisitics of the man who has transcended activity? and who has gone beyond the bonds of Karma.When selfishnes and egoism are destroyed? when desire and personal gain are renounced? actions cannot bind a man. He
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
।।18.17।।तो फिर जो वास्तवमें देखता है ( ऐसा ) सुबुद्धि कौन है इसपर कहते हैं --, शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे तथा न्यायसे जिसका अन्तःकरण भली प्रकार शुद्धसंस्कृत हो गया है? ऐसे जिस पुरुषके अन्तःकरणमें मैं कर्ता हूँ इस प्रकारकी भावनाप्रतीति नहीं होती? जो ऐसा समझता है कि,अविद्यासे आत्मामें अध्यारोपित? ये अधिष्ठानादि पाँच हेतु ही समस्त कर्मोंके कर्ता हैं? मैं नहीं हूँ? मैं तो केवल उनके व्यापारोंका साक्षीमात्र प्राणोंसे रहित? मनसे रहित? शुद्ध श्रेष्ठ? अक्षरसे भी पर केवल और अक्रिय आत्मस्वरूप हूँ। तथा जिसकी बुद्धि यानी आत्माका उपाधिस्वरूप अन्तःकरण? लिप्त नहीं होता -- अनुताप नहीं करता? यानी,मैंने अमुक कार्य किया है उससे मुझे नरकमें जाना पड़ेगा इस प्रकार जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती वह सुबुद्धि है वही वास्तवमें देखता है। ऐसा ज्ञानी इन समस्त लोकोंको अर्थात् सब प्राणियोंको मारकर भी ( वास्तवमें ) नहीं मारता अर्थात् हननक्रिया नहीं करता और उसके परिणामसे अर्थात् पापके फलसे भी नहीं बँधता। पू0 -- यद्यपि यह ( ज्ञानकी ) स्तुति है? तो भी यह कहना सर्वथा विपरीत है कि मारकर भी नहीं मारता,। उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि लौकिक और पारमार्थिक इन दो दृष्टियोंकी अपेक्षासे ऐसा कहना बन सकता है। शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करके मैं मारनेवाला हूँ ऐसा माननेवाले लौकिक मनुष्योंकी दृष्टिका आश्रय लेकर मारकर भी यह कहा है और पूर्वोक्त पारमार्थिक दृष्टिका आश्रय लेकर न मारता है और न बँधता है यह कहा है। इस प्रकार ये दोनों कथन बन सकते हैं। पू0 -- कर्तारमात्मानं केवलं तु इस कथनमें केवलशब्दका प्रयोग होनेसे यह पाया जाता है कि आत्मा,( अकेला कर्म नहीं करता? पर ) अधिष्ठान आदि अन्य हेतुओंके साथ सम्मिलित होकर निःसंदेह कर्म करता है। उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि अविक्रियस्वभाववाला होनेके कारण? आत्माका अधिष्ठानादिसे संयुक्त होना नहीं बन सकता। विकारवान् वस्तुका ही अन्य पदार्थोंके साथ संघात हो सकता है और विकारी पदार्थ ही संहत होकर कर्ता बन सकता है। निर्विकार आत्माका? न तो किसीके साथ संयोग हो सकता है और न संयुक्त होकर उसका कर्तृत्व ही बन सकता है। इसलिये ( यह समझना चाहिये कि ) आत्माका केवलत्व स्वाभाविक है? अतः यहाँ केवल शब्दका अनुवादमात्र किया गया है। आत्माका अविक्रियत्व श्रुतिस्मृति और न्यायसे प्रसिद्ध है। गीतामें भी यह विकाररहित कहलाता है,सब कर्म गुणोंसे ही किये जाते हैं आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी नहीं करता इत्यादि वाक्योंद्वारा अनेक बार प्रतिपादित है और मानो ध्यान करता है? मानो चेष्टा करता है इस प्रकारकी श्रुतियोंमें भी प्रतिपादित है। तथा न्यायसे भी यही सिद्ध होता है? क्योंकि आत्मतत्त्व अवयवरहित? स्वतन्त्र और विकाररहित है। ऐसा मानना ही राजमार्ग है। यदि आत्माको विकारवान् मानें तो भी इसका स्वकीय विकार ही अपना हो सकता है। अधिष्ठानादिके किये हुए कर्म आत्मकर्तृक नहीं हो सकते क्योंकि अन्यके कर्मोंको बिना किये ही अन्यके पल्ले बाँध देना उचित नहीं है। जो अविद्यासे आरोपित किये जाते हैं? वे वास्तवमें उसके नहीं होते। जैसे सीपमें आरोपित चाँदीपन सीपका नहीं होता एवं जैसे मूर्खोंद्वारा आकाशमें आरोपित की हुई तलमलीनता आकाशकी नहीं हो सकती? वैसे ही अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंके विकार भी उनके ही हैं? आत्माके नहीं। सुतरां यह ठीक ही कहा है कि मैं कर्ता हूँ ऐसी भावनाका और बुद्धिके लेपका अभाव होनेके कारण? पूर्ण ज्ञानी न मारता है और न बँधता है। दूसरे अध्यायमें यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है इस प्रकार प्रतिज्ञा करके? न जायते इत्यादि हेतुयुक्त वचनोंसे आत्माका अविक्रियत्व बतलाकर? फिर वेदाविनाशिनम् इस श्लोकसे उपदेशके आदिमें विद्वान्के लिये संक्षेपमें कर्माधिकारकी निवृत्ति कहकर? जगहजगह? प्रसङ्ग लाकर बीचबीचमें जिसका विस्तार किया गया है? ऐसी कर्माधिकारकी निवृत्तिका? अब शास्त्रके अर्थका संग्रह करनेके लिये विद्वान् न मारता है और न बँधता है इस कथनसे उपसंहार करते हैं। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि विद्वान्में देहधारीपनका अभिमान न होनेके कारण उसके अविद्याकर्तृक समस्त कर्मोंका संन्यास हो सकता है? इसलिये संन्यासियोंको अनिष्ट आदि तीन प्रकारके कर्मफल नहीं मिलते। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि दूसरे ( कर्माधिकारी ) इससे विपरीत होते हैं। इस कारण उनको तीन प्रकारके कर्मफल ( अवश्य ) मिलते हैं। इस प्रकार यह गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार किया गया। ऐसा यह समस्त वेदोंके अर्थका सार? निपुणबुद्धिवाले पण्डितोंद्वारा विचारपूर्वक धारण किया जाने योग्य है। इस विचारसे हमने जगहजगह प्रकरणोंका विभाग करके? शास्त्रन्यायानुसार इस तत्त्वको दिखलाया है।।17।।
(Showing excerpt)
18.17 He who has not the feeling of egoism, whose intellect is not tainted, he does not kill, nor does he become bound-even by killing these creatures!
This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.
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