एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः |
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ||३-१६||
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ . aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ||3-16||
।।3.16।। जो पुरुष यहाँ इस प्रकार प्रवर्तित हुए चक्र का अनुवर्तन नहीं करता हे पार्थ इंन्द्रियों में रमने वाला वह पाप आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।।
3.16 एवम् thus? प्रवर्तितम् set revolving? चक्रम् wheel? न not? अनुवर्तयति follows? इह here? यः who? अघायुः living in sin? इन्द्रियारामः rejoicing in the senses? मोघम् in vain? पार्थ O Partha? सः he? जीवति lives.Commentary This is the wheel of action set in motion by the Creator on the basis of the Veda and sacrifice.He who does not follow the wheel by studying the Vedas and performing the sacrifices prescribed therein but who indulges only in sensual pleasures lives in vain. He is wasting his l
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
।।3.16।।इस लोकमें जो मनुष्य कर्माधिकारी होकर इस प्रकार ईश्वरद्वारा वेद और यत्नपूर्वक चलाये हुए इस जगत्चक्रके अनुसार ( वेदाध्ययनयज्ञादि ) कर्म नहीं करता हे पार्थ वह पापायु अर्थात् पापमय जीवनवाला और इन्द्रियारामी अर्थात् इन्द्रियोंद्वारा विषयोंमें रमण करनेवाला व्यर्थ ही जीता है उस पापीका जीना व्यर्थ ही है। इसलिये इस प्रकरणका अर्थ यह हुआ कि अज्ञानी अधिकारीको कर्म अवश्य करना चाहिये। अनात्मज्ञ अधिकारी पुरुषको आत्मज्ञानकी योग्यता प्राप्त होनेके पहले ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये यह न कर्मणामनारम्भात् यहाँसे लेकर शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः इस श्लोकतकके वर्णनसे प्रतिपादन करके यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र से लेकर मोघं पार्थ स जीवति तकके ग्रन्थसे भी आत्मज्ञानसे रहित कर्माधिकारीके लिये कर्मोंके अनुष्ठान करनेमें बहुतसे प्रसङ्गानुकूल कारण कहे गये तथा उन कर्मोंके न करनेमें बहुतसे दोष भी बतलाये गये। यदि ऐसा है तो क्या इस प्रकार चलाये हुए इस सृष्टिचक्रके अनुसार सभीको चलना चाहिये अथवा पूर्वोक्त कर्मयोगानुष्ठानरूप उपायसे प्राप्त होनेवाली और आत्मज्ञानी सांख्ययोगियोंद्वारा सेवन किये जाने योग्य ज्ञानयोगसे ही सिद्ध होनेवाली निष्ठाको न प्राप्त हुए अनात्मज्ञको ही इसके अनुसार बर्तना चाहिये ( या तो ) इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नकी आशङ्का करके ( भगवान् बोले )
(Showing excerpt)
3.16 O Partha, he lives in vain who does not follow here the wheel thus set in motion, whose life is sinful, and who indulges in the senses.
This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.
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