कर्मण्येवाधिकारस्ते
You have the right to act...
कर्मण्येवाधिकारस्ते
You have the right to act...
इस श्लोक पर निर्देशित ध्यान: शांत हो जाइए, इसके अर्थ के साथ श्वास लीजिए, मौन में विश्राम कीजिए, और इसके सार को अपने दिन में ले जाइए।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||२-४८||
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya .
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||2-48||
।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।
सुनें
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||२-४८||
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya .
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||2-48||
BG 2.48
समाधान करें
सफलता और असफलता में संतुलित — वही समता पूरा योग है। दिन के माँगने से पहले इसे यहाँ पाओ।
सार
सफलता और असफलता में भी सम — वही योग है।
श्वास लें
तुम इस क्षण को सम भाव से थामते हो तुम जीत और हार के अंतर को छोड़ते हो
ध्यान करें
यदि जीतना और हारना एक-से लगते, तो तुम क्या भिन्न करते?
साथ ले जाएँ
एक सफलता और एक असफलता लिखो, और जो उनमें साझा है।