कर्मण्येवाधिकारस्ते
You have the right to act...
कर्मण्येवाधिकारस्ते
You have the right to act...
इस श्लोक पर निर्देशित ध्यान: शांत हो जाइए, इसके अर्थ के साथ श्वास लीजिए, मौन में विश्राम कीजिए, और इसके सार को अपने दिन में ले जाइए।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||२-५८||
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo.aṅgānīva sarvaśaḥ .
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||2-58||
।।2.58।। कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है? तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।
सुनें
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||२-५८||
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo.aṅgānīva sarvaśaḥ .
indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ||2-58||
BG 2.58
समाधान करें
जैसे कछुआ अपने अंग समेट लेता है, इन कुछ मिनटों के लिए अपनी इंद्रियों को संसार से कोमलता से समेट लो।
सार
इंद्रियों को कोमलता से भीतर समेटो।
श्वास लें
तुम इंद्रियों को भीतर समेटते हो तुम संसार के खिंचाव को छोड़ते हो
ध्यान करें
किस उत्तेजना से हटकर तुम अधिक पूर्ण अनुभव कर सकते हो?
साथ ले जाएँ
एक चीज़ लिखो जिसकी ओर तुम बहुत बार बढ़ते हो, और जो तुम्हें बाहर बुलाती है।