पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् |
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ||१३-२२||
puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān . kāraṇaṃ guṇasaṅgo.asya sadasadyonijanmasu ||13-22||
।।13.22।। प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।
13.22 पुरुषः Purusha? प्रकृतिस्थः seated in Prakriti? हि indeed? भुङक्ते enjoys? प्रकृतिजान् born of Prakriti? गुणान् alities? कारणम् the cause? गुणसङ्गः attachment to the Gunas? अस्य of his? सदसद्योनिजन्मसु of birth in good and evil wombs.Commentary The soul residing in Nature and identifying itself with the body and the senses which are modifications of Nature acts through the alities of Nature and experiences pleasure and pain and delusion. It thinks? I am happy? I am miserable? I am deluded?
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
13.22 Since the soul is seated in Nature, therefore it experiences the alities born of Nature. Contact with the alities is the cause of its births in good and evil wombs.
।।13.22।।यह जो कहा कि सुखदुःखोंका भोक्तृत्व ही पुरुषका संसारित्व है? सो वह उसमें किस कारणसे है यह बतलाते हैं --, क्योंकि पुरुष -- जीवात्मा प्रकृतिमें स्थित है अर्थात् कार्य और करणके रूपमें परिणत हुई अविद्यारूपा प्रकृतिमें स्थित है -- प्रकृतिको अपना स्वरूप मानता है? इसलिये वह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सुखदुःख और मोहरूपसे प्रकट गुणोंको मैं सुखी हूँ? दुःखी हूँ? मूढ़ हूँ? पण्डित हूँ इस प्रकार मानता हुआ भोगता है अर्थात् उनका उपभोग करता है। यद्यपि जन्मका कारण अविद्या है तो भी भोगे जाते हुए सुखदुःख और मोहरूप गुणोंमें जो आसक्त हो जाना है -- तद्रूप हो जाना है? वह जन्मरूप संसारका प्रधान कारण है। वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही कर्म करता है इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसी बातको भगवान् कहते हैं कि गुणोंका सङ्ग ही अर्थात् गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुषके अच्छीबुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है। अच्छी और बुरी योनियोंका नाम सदसत् योनि है? उनमें जन्मोंका होना सदसद्योनिजन्म है? इन भोग्यरूप सदसद्योनिजन्मोंका कारण गुणोंका सङ्ग ही है। अथवा संसारपदका अध्याहार करके यह अर्थ कर लेना चाहिये कि अच्छी औरबुरी योनियोंमें जन्म लेकर गुणोंका सङ्ग करना ही इस संसारका कारण है। देवादि योनियाँ सत् योनि हैं और पशु आदि योनियाँ असत् योनि हैं। प्रकरणकी सामर्थ्यसे मनुष्ययोनियोंको भी सत् असत् योनियाँ माननेमें ( किसी प्रकारका ) विरोध नहीं समझना चाहिये। कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनारूप अविद्या और गुणोंका सङ्ग -- आसक्ति ये ही दोनों संसारके कारण हैं और वे छोड़नेके लिये ही बतलाये गये हैं। गीताशास्त्रमें इनकी निवृत्तिके साधन संन्यासके सहित ज्ञान और वैराग्य प्रसिद्ध हैं। वह क्षेत्रक्षेत्रज्ञविषयक ज्ञान पहले बतलाया ही गया है। साथ ही ( न सत्तन्नासदुच्यते इत्यादि कथनसे ) अन्यों ( धर्मों ) का निषेध करके और ( सर्वतः पाणिपादम् इत्यादि कथनसे ) अनात्म धर्मोंका अध्यारोप करके ज्ञेयके स्वरूपका भी यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते आदि वचनोंसे प्रतिपादन किया गया है।
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