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BG 13.21 — 13.21 In the production of the effect and the cause, Nature (matter) is said to be the cause; in the experience of pleasure and pain, the soul is said to b | Live Gita
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कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते |
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ||१३-२१||

kāryakāraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate . puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate ||13-21||


।।13.21।। कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

Word-by-word meanings

13.21 कार्यकारणकर्तृत्वे in the production of the effect? and the cause? हेतुः the cause? प्रकृतिः Prakriti? उच्यते is said (to be)? पुरुषः Purusha? सुखदुःखानाम् of pleasure and pain? भोक्तृत्वे in the experience? हेतुः the cause? उच्यते is said (to be).Commentary Pleasure and pain are the fruits of virtuous and vicious actions. The force of desire acts on the mind and the mind impels the senses to act to get the objects of desire. Good and evil actions proceed from Nature and lead to happiness

Commentaries

Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.

Sri Shankaracharya

।।13.21।।प्रकृतिसे उत्पन्न हुए वे विकार और गुण कौनसे हैं --, कार्य शरीरको कहते हैं और उसमें स्थित ( मन? बुद्धि? अहंकार तथा दश इन्द्रियाँ -- ये ) तेरह कारण हैं। इनके कर्त्तापनमें ( हेतु प्रकृति है )। शरीरको उत्पन्न करनेवाले पाँच भूत और शब्द आदि पाँच विषय ये पहले कहे हुए प्रकृतिजन्य दश विकार तो यहाँ कार्यके ग्रहणसे ग्रहण किये जाते हैं और सुखदुःख? मोह आदिके रूपमें परिणत हुए प्रकृतिजन्य समस्त गुण बुद्धि आदि कारणोंके आश्रित होनेके कारण करणोंके ग्रहणसे ग्रहण किये जाते हैं। उन कार्य और करणोंका जो कर्तापन अर्थात् उनको उत्पन्न करनेका भाव है उसका नाम कार्यकरण कर्तृत्व है? उन कार्यकरणोंके कर्तृत्वमें आरम्भ करनेवाली होनेसे प्रकृति कारण कही जाती है। इस प्रकार कार्यकरणोंको उत्पन्न करनेवाली होनेसे प्रकृति संसारकी कारण है। कार्यकारणकर्तृत्वे ऐसा पाठ माननेसे भी यही अर्थ होगा कि जो जिसका परिणाम है? वह उसका कार्य अर्थात् विकार है? और कारण विकारी -- विकृत होनेवाला -- है। उन विकारी और विकाररूप कारण और कार्योंके उत्पन्न करनेमें ( प्रकृति हेतु है )। अथवा सोलह विकार तो कार्य और सात प्रकृति विकृति कारण हैं? इस प्रकार ये ( तेईस तत्त्व ) ही कार्यकारणके नामसे कहे जाते हैं। इनके कर्तापनमें प्रारम्भकत्वसे ही प्रकृति हेतु कही जाती है। पुरुष भी जिस प्रकार संसारका कारण होता है? सो कहा जाता है -- पुरुष अर्थात् जीव? क्षेत्रज्ञ? भोक्ता इत्यादि जिसके पर्याय शब्द है? वह सुखदुःख आदि भोगोंके भोक्तापनमें,अर्थात् उनका उपभोग करनेमें हेतु कहा जाता है। पू0 -- परंतु इस कार्यकरणके कर्तापनसे और सुख दुःखके भोक्तापनसे प्रकृति और पुरुष दोनोंको संसारका कारण कैसे बतलाया जाता है उ0 -- कार्यकरण और सुखदुःखादिरूप हेतु और फलके आकारमें प्रकृतिका परिणाम न होनेपर तथा चेतन पुरुषमें उन सबका भोक्तापन न होनेसे संसार कैसे सिद्ध होगा। जब कार्यकरणरूप हेतु और फलके आकारमें परिणत हुई भोग्यरूपा प्रकृतिके साथ उससे विपरीत धर्मवाले पुरुषका? भोक्ता भावसे अविद्यारूप संयोग होगा? तभी संसार ( प्रतीत ) होगा। इसलिये प्रकृतिके कार्यकरणविषयक कर्तापन और पुरुषके सुख दुःखविषयक भोक्तापनको लेकर जो उन दोनोंका संसारकारणत्व प्रतिपादन किया गया? वह उचित ही है। पू0 -- तो यह संसारनामक वस्तु क्या है उ0 -- सुख दुःखोंका भोग ही संसार है और पुरुषमें जो सुखदुःखोंका भोक्तृत्व है? यही उसका संसारित्व है।

(Showing excerpt)

Swami Gambirananda

13.21 With regard to the source of body and organs, Nature is said to be the cause. The soul is the cause so far as enjoyership of happiness and sorrow is concerned.

This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.

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