प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि |
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ||१३-२०||
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādi ubhāvapi . vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisambhavān ||13-20||
।।13.20।। प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।
13.20 प्रकृतिम् matter? पुरुषम् spirit? च and? एव even? विद्धि know? अनादी beginningless? उभौ both? अपि also? विकारान् modifications? च and? गुणान् alities? च and? एव even? विद्धि know? प्रकृतिसंभवान् born of Prakriti.Commentary Steps are necessary to reach the top floor of a building. Even so? steps are necessary to reach the summit of the knowledge of the Self. That is the reason why Lord Krishna took Arjuna to the summit of knowledge step by step. He first taught Arjuna the nature of the fiel
Non-dualism. The individual self and Brahman are one. The world is appearance (maya). Liberation through knowledge.
।।13.20।।सातवें अध्यायमें ईश्वरकी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप अपरा और परा -- दो प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं तथा यह भी कहा गया है कि ये दोनों प्रकृतियाँ समस्त प्राणियोंकी योनि ( कारण ) हैं। अब यह बात बतलायी जाती है कि वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों प्रकृतियाँ सब भूतोंकी योनि किस प्रकार हैं --, प्रकृति और पुरुष जो कि ईश्वरकी प्रकृतियाँ हैं? उन दोनोंको ही तू अनादि जान। जिनका आदि न हो उनका नाम अनादि है। ईश्वरका ईश्वरत्व नित्य होनेके कारण उसकी दोनों प्रकृतियोंका भी नित्य होना उचित ही है क्योंकि इन दोनों प्रकृतियोंसे युक्त होना ही ईश्वरकी ईश्वरता है। जिन दोनों प्रकृतियोंद्वारा ईश्वर जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका कारण है? वे दोनों अनादिसिद्ध ही संसारकी कारण हैं। कोईकोई टीकाकार जो आदि ( कारण ) नहीं हैं वे अनादि कहे जाते हैं? इस प्रकार यहाँ तत्पुरुषसमासका वर्णन करते हैं ( और कहते हैं कि ) इससे केवल ईश्वर ही जगत्का कारण है? यह बात,सिद्ध होती है। यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य माना जाय तो संसार उन्हींका रचा हुआ माना जायगा? ईश्वर जगत्का कर्ता सिद्ध न होगा। किंतु ऐसा मानना ठीक नहीं क्योंकि ( यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य न माने तो ) प्रकृति और पुरुषकी उत्पत्तिसे पूर्व शासन करने योग्य वस्तुका अभाव होनेसे ईश्वरमें अनीश्वरताका प्रसङ्ग आ जाता है। तथा संसारको बिना निमित्तके उत्पन्न हुआ माननेसे उसके अन्तके अभावका प्रसङ्ग? शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग और बन्धमोक्षके अभावका प्रसङ्ग प्राप्त होता है? ( इसलिये भी उपर्युक्त अर्थ ठीक नहीं है। ) परंतु ईश्वरकी इन दोनों प्रकृतियोंको नित्य मान लेनेसे यह सब व्यवस्था ठीक हो जाती है। कैसे ( सो कहते हैं -- ) विकारोंको और गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न जान अर्थात् बुद्धिसे लेकर शरीर और इन्द्रियोंतक अगले श्लोकमें बतलाये हुए विकारोंको तथा सुखदुःख और मोह आदि वृत्तियोंके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न हुए जान। अभिप्राय यह है कि विकारोंकी कारणरूपा जो ईश्वरकी त्रिगुणमयी माया शक्ति है? उसका नाम प्रकृति है। वह जिन विकारों और गुणोंको उत्पन्न करनेवाली है? उन विकारों और गुणोंको तू प्रकृतिजनित -- प्रकृतिके ही परिणाम समझ।
(Showing excerpt)
13.20 Know both Nature and also the individual soul [Prakrti is sometimes translated as matter, and purusa as spirit.-Tr.] to be verily without beginning; know the modifications as also the alities as born of Nature.
This interpretation draws on the Advaita tradition and may not represent the view of any single school. For authoritative guidance within a specific tradition, seek a qualified teacher.
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